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Satna: शिवाजी का चरित्र कलंक रहित था : श्री हेमंत मुक्तिबोध

  • हिंदवी स्वराज्य की अवधारणा और भारत का अमृतकाल विषय पर मुख्य वक्ता ने रखे विचार
  • युद्ध का रास्ता केवल बलिदान नहीं विजय का भी हो सकता है

सतना, भास्कर हिंदी न्यूज़/ अप्रतिम योद्धा और भारतीय स्व के प्रवर्तक छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा स्थापित हिंदवी स्वराज के 350 गौरवशाली वर्ष पूर्णता के वर्ष एवं स्वाधीनता के अमृतकाल पर स्थानीय समाचार पत्र ‘नव स्वदेश’ द्वारा आयोजित संवाद कार्यक्रम में मुख्यवक्ता हेमंत मुक्तिबोध सह क्षेत्रकार्यवाह एवं विचारक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, मध्य क्षेत्र ने अपने सारगर्भित उद्बोधन में कहा कि छत्रपति वीर शिवाजी महाराज का जीवन हमेशा से अनुकरणीय रहा। यही कारण था वीर शिवाजी के जीवन चरित्र की सराहना उनके कट्टर विरोधी भी करते थे। औरंगजेब भी शिवाजी महाराज का मुरीद था। जब शिवाजी प्रतापगढ़ किले से बचकर निकले तब औरगंजेब से उसके सैनिकों ने पूछा कि हम शिवाजी को क्यों नहीं पकड़ा पाते। तब औरंगजेब ने कहा था कि औरत, शराब , नाच-गाने, इश्क -मोहब्बत में गिरफ्तार तुम लोगों को यह समझ नहीं आएगा। शिवाजी ने किले बनाए, फौज बनाई और उससे जयादा न जीत सकने वाले मजबूत जमीर वाले लोग बनाए हैं। शिवा के सैनिक थकते नहीं, झुकते नहीं, बिकते नहीं और डिगते नहीं। मैने उसके सैनिकों को खरीदने और लालच देकर अपनी ओर करने की पूरी कोशिश की, लेकिन तब भी ऐसा नहीं हुआ। शिवा क्रूर है, मगरुर है। लेकिन उसका चरित्र दूध की तरह साफ सूर्य की तरह चमकदार है। यह मेरा सौभाग्य है कि मुझे दुश्मन भी शिवा जैसा मिला है।

इससे पूर्व स्वदेश समूह के समूह संपादक अतुल तारे ने संवाद कार्यक्रम की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि ‘नव स्वदेश’ नाम से ही स्पष्ट है कि यह वैचारिक अधिष्ठान है। बाजारवादी पत्रकारिता के बावजूद अपना स्थान बनाए हुए है। स्वाधीनता के मिशन से यह समाचार पत्र शुरू हुआ और आज भी मूल्य आधारित पत्रकारिता कर रहा है। श्री तारे ने शिवाजी महाराज के जीवन को सुशासन का पर्याय बताया। कार्यक्रम का संचालन मनमोहन माहेश्वरी ने किया।

कलंक रहित चरित्र

मुक्तिबोध ने कहा कि शिवाजी का चरित्र कलंक रहित था। इसके कई उदाहरण मिलते हैं। सूरत शहर की लूट कांड इसका उदाहरण है। शिवाजी के सैनिक जब सूरत शहर लूटने गए थे तब सैनिकों को एक डच महिला के घर की तरफ न जाने की नसीहत दी थी। पूरा शहर बेचिराग हुआ। लेकिन उस डच बेवा महिला की ओर किसी ने देखा तक नहीं। इसके अलावा उन्होंने धारवाड़ में लूट करने के दौरान अपने सैनिकों को वहां की रानी की तरफ बुरी निगाह न रखने के निर्देश दिए। लेकिन एक सैनिक ने उसके साथ दुव्र्यवहार करने की कोशिश की। जिसके बाद शिवाजी ने उसे सजा दी।

सिद्धांत विहीन अखबार, सिद्धांत विहीन विचार को जन्म देता है

मुख्यवक्ता हेमंत मुक्तिबोध ने संवाद कार्यक्रम की सराहना करते हुए कहा कि नव स्वदेश साधुवाद का पात्र है प्राय: ऐसे आयोजन समाचार पत्र नहीं करते। लेकिन नव स्वदेश ने ऐसा किया। कहा जाता है कि सिद्धांत विहीन मतदान, सिद्धांत विहीन नेतृत्व को जन्म देता है। वैसे ही सिद्धांत विहीन अखबार सिद्धांत विहीन विचार को जन्म देता है। नव स्वदेश ने सिद्धांत के आधार पर काम करने की प्रतिबद्धता दिखाई है। उन्होंने सभी लोगों से आग्रह किया कि वे नव स्वदेश के इस अभियान में अपना सहयोग दें।

बलिदान ही नहीं विजय का रास्ता भी है युद्ध

मुख्यवक्ता हेमंत मुक्तिबोध ने शिवाजी पर व्याख्यान देते हुए कहा कि छत्रपति शिवाजी का जब राज्याभिषेक हो रहा था तब वे तैयार नहीं थे। उनके पिता शाहाजीराजे, माता जी जिजाबाई और उनके गुरू स्वामी सामर्थ ने कहा था कि हे हिंदवी स्वाराज्य व्हावे ही श्रींची इच्छा।इसका परिणाम क्या हुआ? हिंदवी साम्राज्य के लिए लोगों का झुकाव बढऩे लगा। औरंगजेब की चाकरी और कसीदे पढ़ले वाला कवि कुलभूषण उसे छोड़कर शिवाजी के पास आ गया। राजा छत्रसाल ने भी शिवाजी के साथ मिलकर युद्ध लडऩे की इच्छा जाहिर की। लेकिन उन्होंने कहा कि मैं महाराष्ट्र में देख रहा हूं आप बुंदेलखंड में अपने साम्राज्य के साथ लड़ाई लड़ें। हिंदू राष्ट्र की स्थापना का संदेश देते हुए कहा कि युद्ध का रास्ता केवल बलिदान नहीं विजय का भी हो सकता है।

शिवाजी ने प्रतापगढ़ में अफजल खां का वध किया

औरंगजेब के आगरा लौट जाने के बाद बीजापुर के सुल्तान ने भी राहत की सांस ली। अब शिवाजी ही बीजापुर के सबसे प्रबल शत्रु रह गए थे। शाहजी को पहले ही अपने पुत्र को नियन्त्रण में रखने को कहा गया था पर शाहजी ने इसमें अपनी असमर्थता जाहिर की। शिवाजी से निपटने के लिए बीजापुर के सुल्तान ने अब्दुल्लाह भटारी (अफजल खां) को शिवाजी के विरूद्ध भेजा। अफजल ने अपने सैनिकों के साथ कूच किया। तुलजापुर के मन्दिरों को नष्ट करता हुआ वह सतारा से उत्तर वाई, शिरवल के नजदीक तक आ गया। पर शिवाजी प्रतापगढ़ के दुर्ग पर ही रहे। अफजल खां ने अपने दूत कृष्णजी भास्कर को सन्धि-वार्ता के लिए भेजा। उसने उसके मार्फत सन्देश भेजा अगर शिवाजी बीजापुर की अधीनता स्वीकार कर ले तो सुल्तान उसे उन सभी क्षेत्रों का अधिकार दे देंगे जो शिवाजी के नियंत्रण में हैं। सन्धि का षडयंत्र रचकर अफजल खां शिवाजी को बन्दी बनाना चाहता था। शिवाजी ने सैनिकों की संख्या देखते हुए प्लानिंग तैयार की। उसे पहाड़ में ले गए और अफजल खां को मार दिया।

बचपन से ही थे साहसी

शिवाजी महाराज के बाल्यकाल पर अपने विचार रखते हुए मुख्यवक्ता श्री मुक्तिबोध ने कहा कि महज आठ साल की उम्र में शिवाजी ने मुगलों से लड़ाई का संकल्प लिया। जब उनके पिता ने आदिलशाह को नमस्कार करने को कहा तो छत्रपति ने मना कर दिया। तेरह साल की उम्र में गौवंश की रक्षा के लिए बीजापुर में कसाई के हाथ की रस्सी काट दी जिससे वह गौमाता को बांधकर काटने के लिए ले जा रहा था। यही नहीं मुगलों के खिलाफ समाज को खड़ा किया। इसके अलावा तोरण का किला जीतकर अपने अदम्य साहस का परिचय दिया।

व्यक्ति में बदलाव होगा तो समाज बदलेगा-डा. राजकुमार आचार्य

व्याख्यान कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे अवधेश प्रताप सिंह विश्व विद्यालय के कुलपति डा. राजकुमार आचार्य ने अपने उद्बोधन में कहा कि हम सब जब राष्ट्र के बारे में विचार करते हैं तो हम छोटे दिखाई देते हैं। एक हजार साल का इतिहास पढ़ें तो हमें समझ आता है कि भारत किन-किन आक्रांताओं की पीड़ादायी परिस्थितियों से गुजरा है, परंतु आज उसका विश्व में डंका बज रहा है। शिवाजी महाराज ने अपनी माता के संस्कार और परिवार के संस्कार से श्रेष्ठता प्राप्त की। शिवाजी ने 16 वर्ष की आयु पहले किला जीता तब भोजन ग्रहण किया। ये गाथाएं उनकी संकल्प शक्ति को प्रदर्शित करती हैं।
शिवाजी सदैव भेदभाव व छुआछूत के खिलाफ रहे। डा. आचार्य ने कहा कि जब छत्रपति शिवाजी के राज्यारोहण का अवसर आया तब बनारस के पंडितों ने 28 घंटों में संस्कृत के उच्चारण से श्लोक तैयार किये थे। यह दर्शाता है कि शिवाजी का धर्म और सनातन धर्म की आदि भाषा संस्कृत के प्रति कितना प्रेम था। कुलपति डा. आचार्य ने कहा कि उनके शासन काल में किसी भी संदर्भ में छूट देने जैसी कोई विकृति नहीं थी। वर्तमान समय में हमारे समाज में कई तरह की विकृतियां आ गई हैं। उन्होंने कहा कि यह हम सब के लिए विचारणीय प्रश्न है कि आज हम, हमारे बच्चे और परिवार कहां जा रहा है? चारों तरफ बदलाव की लहर है। लोगों की श्रेष्ठता में बदलाव आ रहा है। डा. आचार्य ने कहा कि हम आज भारत के अमृतकाल की बात कर रहे हैं, हमारी प्रतिबद्धता, हमारा प्रयास एवं पूर्ण विश्वास होना चाहिए कि भारत जब आजादी का 100 वां वर्ष मनाए तो वसुधैव कुटुम्बकम, अतिथि देवो भव: एवं सोने की चिडिय़ा के रूप में समूचे विश्व का नेतृत्व करे।

भारत में आजादी की श्वांस का बीज शिवाजी ने बोया: महापौर

इस अवसर पर कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि एवं सतना के महापौर योगेश ताम्रकार ने छत्रपति महाराज शिवाजी के जीवन पर प्रकाश डालते हुए कहा कि हिंदवी स्वराज के प्रणेता के रूप में आज यदि हम 350 साल बाद शिवाजी को याद कर रहे हैं तो निश्चित तौर पर उनकी वीर गाथाएं अविस्मरणीय होंगी। भारत में आजादी की श्वांस का बीज शिवाजी ने बोया था। जीजा माता ने जिस बीज को पाला- पोसा उसने भारत के लिए गुलामी की बेड़ी तोड़ी। 1857 में यदि जीतते तो बात अलग थी। कुछ लोग यह भी आरोप लगाते रहे हैं कि शिवाजी ने सिर्फ महाराष्ट्र के लिए लड़ाई लड़ी पर ऐसा नहीं था उन्होंने आजादी की लड़ाई का जो बीज महाराष्ट्र में बोया उसकी गूंज बुंदेलखंड तक सुनाई दी। बुंदेलखंड में महाराजा छत्रसाल ने आजादी के लिए इस लड़ाई को जन-जन तक पहुंचाया। महापौर श्री ताम्रकार ने महत्वपूर्ण एवं वैचारिक व्याख्यान कार्यक्रम के लिए नव स्वदेश का साधुवाद ज्ञापित किया।

अंतर्राष्ट्रीय मंचो पर भारतवासियों का सम्मान गौरव की बात: अनंत सोनी

विशिष्ट अतिथि की आसंदी से कार्यक्रम में उपस्थित लोगों को संबोधित करते हुए एकेएस विश्वविद्यालय के चेयरमैन अनंत सोनी ने कहा कि इस तरह के आयोजन होते रहने चाहिए इससे लोगों में वैचारिक परिवर्तन आता है। श्री सोनी ने कहा कि छत्रपति शिवाजी महाराज की गोरिल्ला युद्ध नीति को विदेशों ने भी अपनाया। वियतनाम जैसे छोटे देश ने शिवाजी की युद्ध नीति अपना कर अमेरिका जैसे बड़े देश पर विजय प्राप्त की। शिवाजी का शासन काल सामरिक, आर्थिक, सामाजिक एवं नेतृत्व क्षमता से परिपूर्ण था। श्री सोनी ने अपने उद्बोधन में कहा कि आज के दौर में जब देश की प्रतिभाओं का सम्मान विदेशों में होता है तो हम सब के लिए वह क्षण गौरान्वित करने वाला होता है। भारतीय प्रतिभाओं का विदेशों में सम्मान अनुकरणीय है। जिन्होंने आजादी के पहले हमे लूटा अब वे ही अपनी सरजमीं पर हमारा सम्मान कर रहे हैं। श्री सोनी ने कहा कि बच्चों में राष्ट्रवाद की भावना हम सभी को भरनी चाहिए जिससे उनके सर्वांगीण विकास के साथ-साथ उन्हें राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्य एवं दायित्वों का बोध हो सके।

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