अपनी बात

अपनी आवाज़ उठाना भी जरूरी 

देश मे इन दिनों चारों तरफ सिर्फ और सिर्फ डिजिटलीकरण की चर्चा हो रही है। हालात ऐसे बना दिए गए हैं मानो इंसान सांस भी ले रहा है तो डिजिटल ईश्वर की कृपा से..!!! सोशल प्लेटफॉर्म इतने हो गए हैं कि उनकी गिनती करना मानो आसमान में तारे गिनने जैसा हो। डिजीटलीकरण की इस अंधी दौड़ में गरीब तो वैसे ही गरीब था अब और भी बेचारा हो गया। गांवों में पांचवी- आठवीं तक पढा किसान अनपढ़ों की श्रेणी में आ गया है क्योंकि वह ना तो स्मार्टफोन का मालिक है और ना ही उसे पिन, पासवर्ड और ओटीपी की जंग में कूदना आता है। उसके कथित “अनपढ़” होने का भरपूर फायदा साइबर कंपनियां और बैंक उठा रहे हैं। कमाल तो यह है कि पूरे विश्व में ईमानदार सरकार होने का खम ठोंकने वाली सरकारें ऐसा कोई ठोस प्रावधान नहीं ला सकीं जिससे गरीब -गुरबों की डिजिटल खिलाड़ियों द्वारा धोखाधड़ी कर लूटी गई खून पसीने की कमाई उन्हें वापस मिल जाए।
डिजीटल भारत के रंगीन सपनों में आम आदमी, गरीब, गांव का किसान खो गया है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया समूहों ने घर-घर घुस कर लोगों को सुनहरे ख्वाबों का जो रंगीन चश्मा पहनाया है, उसमें सावन के अंधे को भी सब हरा-हरा ही दिख रहा है। जब तक ये कथित रंगीन चश्मा सामान्य लोगों की आंखों से उतरेगा, तब तक देश की आर्थिक जमीन बंजर हो चुकी होगी। जीडीपी के ताजा आंकड़े डिजिटल एवं आत्मनिर्भर भारत तथा वोकल फ़ॉर लोकल की भयावह तस्वीर दिखा रहे हैं।
देश को कोरोना की दहशत में झोंक कर विकास के पहिये को भाषणबाजी की ऊबड़खाबड़ सड़कों में इस तरह फंसा दिया गया कि पूरा देश भविष्य में अपने आपको पतन के गर्त में जाता देख रहा है। मीडिया जगत सच्चाई दिखाने की बजाए एक दूसरे की खबरों को झूठा ठहराने और अपने आपको राजा हरिश्चंद्र साबित करने की लड़ाई लड़ रहे हैं। इतना ही नही, देश की जनता को बेवकूफ दिखाते हुए रेटिंग में अपने आपको सर्वश्रेष्ठ दिखाने की ब्रेकिंग चला रहे हैं..!! तो क्या ब्रेकिंग न्यूज़ के मायने बदल गए हैं या फिर आम लोगों को सब अपने अपने हिसाब से ब्रेकिंग न्यूज़ के मायने समझाए जा रहे हैं..? हद तो ये है कि रिया और सुशांत के मामले में कुछ न्यूज़ चैनल न्याय पालिका की तरह मीडिया ट्रायल की जंग लड़ते दिखाई दिए। क्या यही लोकतंत्र है जिसमे पूरा देश समाचारों में सिर्फ सुशांत-रिया, भारत-पाक,भारत-चीन, जैसी गुत्थियों में उलझ कर रहा गया है। उन लोगों की पीड़ा कहाँ गायब हो गईं जो लॉकडॉउन में हजारों किलोमीटर दुधमुँहे बच्चों को लेकर तपती दोपहरी में अपने घर पहुँचे। आज वो किस हाल में हैं, उन कम्पनियों पर ताले लटक गए जहाँ काम करते हुए करोड़ों लोगों ने बच्चों और अपने परिवार को बेहतर भविष्य देने के सपने देखे। अपने आपको बेहतर दिखाने की होड़ में लगे न्यूज़ चैनलों से क्या ये सवाल नही पूछा जाना चाहिए कि लॉकडाउन के दौरान छाती पीट-पीट कर संवेदनशील होने की दुहाई देने का दम आखिर कहां चला गया..? या फिर खबरों के ट्रायल में संवेदना मर गयी…!
दरअसल हमे लगता है कि हम, आप सब खामोश रह कर इनकी चीख- पुकार को और हवा देते हैं, और इन्हें लगता है कि इनकी चीख-पुकार इनकी आधी-अधूरी, अर्धसत्य खबरों को सत्य ठहराती है। जरूरत इस बात की है कि माध्यम कोई भी हो हमे भी अपनी आवाज़ तेज़ करनी होगी अन्यथा सियासतदानों और गला फाड़ चैनलों की आवाजें हमारे, आपके कान फाड़ देंगी।

ऋषि पंडित ( प्रधान संपादक )

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